शुक्रवार, अगस्त 06, 2010

" प्यार "

'प्यार' एक शब्द नहीं है...
और ना ही है -
ध्वनि मात्र .....

प्यार तो एक
अनुभूति है ...
भावनाओ का मंजर है ...
धडकनों का स्पंदन है ....

'प्यार'
तुम्हारी स्वभावानाओ का
उद्दगार है ...
तुम्हारी सुदेह की प्रतिकृति है,
और
अभिव्यक्ति है तुम्हारे
ह्रदय भावो की ....

'प्यार'
सिर्फ पोषक नहीं रिश्तो का
यह प्रस्फुटन है संभावनाओ का ....

गुरुवार, अगस्त 05, 2010

मां...

मां...
क़ुहासे की ऊची दीवारो से झाकती एक छवि
धुन्ध की मोटी परत को तोड़्ती एक किरण

परेशानियो की तेज धार को चीरती एक नैया
आग की तेज तपन को हटाती एक ठन्डक

आन्सू भरी आन्खो मे उभरी सांत्वना की एक तस्वीर
हर दर्द की आह के पीछे खुशी की आवाज

हर परेशानी मे लड़ने की हिम्मत
हर गलत कदम के पीछे सही राह दिखाती एक पथ प्रदर्शक

हर सुख दुख को बांटती एक सखी
जीवन पाठ सिखाती एक गुरु

हां...
हर तकदीर से झांकती एक तस्वीर है
मां...

जिसकी हर दुआ मे बसी मेरी खुशी है
जिसकी आंखो से झलकती तस्वीर मेरी है
जिसकी छवि मे दिखता अस्तित्व मेरा है

वही तो है...
मेरी जीवनदायिनी

कहीं ना कहीं इस जग की कर्णधारिणी
मेरी मां...
मां...

सोमवार, जून 14, 2010

" अनमोल सुबह "

वो सुबह नयी थी और शायद सबसे अलग भी,

क्योंकि -

उस सुबह का सूर्योदय नव उदय था मेरे जीवन में

तुम्हारे रूप में ...

एक खुबसूरत संभावना...

की जैसे - िसी चित्रकार ने कोई अक्स बनाया हो

की जैसे - किसी शिल्पी ने ढी हो कोई मूरत अपने मन मंदिर में

की जैसे - किसी कवि ने कोई नया शब्द पिरोया हो अपनी कविता में

की जैसे - किसी कोई मीठा सुर निकला हो किसी साज से ....॥


तुम्हारी उड़ान को अब और विस्तार मिलेगा ,

तुम्हारे खाव्बो के हंस उड़ेंगे और ऊँचे....


क्योंकि -

मैं अपने हिस्से का आकाश भी तुम्हे सौप रही हूँ

रविवार, दिसंबर 27, 2009

"क्यों"

दिल कहता है
थम जा, रुक जा
मन कहता है ये मृगमरीचिका है,
कभी तो तृप्ति होगी
दिमाग कहता है
ये उम्मीदें है,टूट जायेगी
हालात कहते है जिम्मेदारिया है,
जरुरी है, पूरी करो .....
मैं कहती हूँ -
सब कुछ अपने आप हो रहा
है मैं किसी की कुछ भी नहीं,
फिर भी "क्यों" बेनाम, बेवजह, बेबुनियाद
चाहत..... कशिश
जन्म ले रही है ......

शुक्रवार, अक्टूबर 23, 2009

"तलाश "

हर मोड़ पे सफर में जिन्दगी
केआजकल करवट बदल लेती है जिन्दगी
दिशा उठा लेती है
शरीर का बोझा,
दो कदमो के सहारे....

और -

मैं पाती हूँ अपने आप को एक ऐसी जगह,
जहाँ से नजर भी नहीं आते किनारे....
तब -बहुत दूर निकल जाती हूँ
किनारे की तलाश में
पर कुछ नहीं आता हाथ में....

क्योकि -
मंजिल मेरी जिन्दगी की अनजान हैं
किनारों से न अपनी जरा भी पहचान है .........

( "प्राची" की कलम से )

बुधवार, सितंबर 30, 2009

ऐ मेरी जिन्दगी...

ऐ मेरी जिन्दगी...
मेरे लिए तुम एक अनजान सी मंजिल का
अनजान सा सफ़र थे
लेकिन आज -
तुम्हारे होने का मुझे अहसास है
तुम्हारे वजूद का...तुम्हारे यथार्थ का मुझे भान है ।
मैंने तुम्हे पहचाना है, मैंने तुम्हे छुआ है
और-
मैंने तुम्हे महसूस किया है ...

ऐ मेरी जिन्दगी...
किसी का किसी में रम जाना,
गुम हो जाना, समां जाना
कोई घटना नहीं बल्कि
"आध्यात्म" है
"आध्यात्म" यानि राधा का कृष्ण में समां जाना "
मेरा तुम्हारे लिए 'प्यार'
एक घटना नहीं बल्किलगातार बढ़ने वाला
भावनाओं का सागर है
ठहरा हुआ मंजर नहीं
बल्कि ना रुकने वाला 'कारंवा' है....

ऐ मेरी जिन्दगी
मैंने तुम्हे, तुम्हारे ही लिए ,
तुमको तुम्ही से चुराकर
अपने आप में रमाया है।
मैं मुझ सी न रहकर
तुम सी हो गयी हूँ ......
विलीन हो गई हूँ तुम में....
मेरा वजूद बन चुका है
एक हिस्सा तुम्हारे अस्तित्व का ।

ऐ मेरी जिन्दगी....
में तुम्हारे वजूद का बन आईना
तुम्हारे व्यक्तित्व को निखारना, संवारना चाहती हूँ।
तुम्हारी धडकनों के संग संग धडकना चाहती हूँ।
बन के खून बहना चाहती हूं
तुम्हारी नसों में....
ओज बन टपकाना चाहती हूँ तुम्हारे चेहरे से......
में तुम्हारे जर्रे जर्रे में खोकर,
तुम्हारे रोम रोम में समाकर
'आध्यात्म' को पाना चाहती हूं...

ऐ मेरी जिन्दगी ....
नियति कुछ लोगो को सदैव
'योग्यतम' के लिए चुन लेती है
तुम भी उनमे से एक हो...
तुम कल अव्वल थे,
तुम्हे सर्वोताम बने रहना है।
वो किसी ने तुम्हारे लिए ही कहा है -
" मील के पत्थर के सहारे मंजिल तक पहुचना क्या
राहे गर आंसा हो तो मजा नहीं कुछ पाने में

"ऐ मेरी जिन्दगी...
तुम सफ़र तय
करो मंजिले खुद ब खुद
तुम्हारे कदमो के निंशा तलाश लेगी ।
तुम बढो आगे...
में रहूंगी हर मोड़ पर साथ सफ़र के
और - कदम दर कदम चलूंगी तुम्हारे संग संग
में भी चाहूंगी निष्ठाये और समर्पण
तुम्हारी भावनाओं का....