सोमवार, जून 14, 2010

" अनमोल सुबह "

वो सुबह नयी थी और शायद सबसे अलग भी,

क्योंकि -

उस सुबह का सूर्योदय नव उदय था मेरे जीवन में

तुम्हारे रूप में ...

एक खुबसूरत संभावना...

की जैसे - िसी चित्रकार ने कोई अक्स बनाया हो

की जैसे - किसी शिल्पी ने ढी हो कोई मूरत अपने मन मंदिर में

की जैसे - किसी कवि ने कोई नया शब्द पिरोया हो अपनी कविता में

की जैसे - किसी कोई मीठा सुर निकला हो किसी साज से ....॥


तुम्हारी उड़ान को अब और विस्तार मिलेगा ,

तुम्हारे खाव्बो के हंस उड़ेंगे और ऊँचे....


क्योंकि -

मैं अपने हिस्से का आकाश भी तुम्हे सौप रही हूँ