रविवार, नवंबर 07, 2010

सिखाया था माँ ने........

हँसोगे तो संग- संग ये दुनिया हँसेगी,
रोने पे सब कह देंगे बेगाना ,
सिखाया था माँ ने ये गुर बहुत पहले ,
हमीं न-समझ थे ,बढ़ी देर से माना !!!

मुहब्बत हो किसी से कितनी भी गहरी ,
आखिर इंसां है ..फ़रिश्ता नहीं है ,
ज़रा सी भी उलझन न हो जिसमे ,
ऐसा दुनिया में कोई रिशता नहीं है ,

दिल में हो उदासी भले जितनी भी छाई ,
हर हाल में हल पल तू बस मुस्कुराना ,
सिखाया था माँ ने ये गुर बहुत पहले ,
हमीं न-समझ थे ,बढ़ी देर से माना !!!

सच हो जो कहना ....,ज़रा सोच लेना ,
झूठ के लिए कोई तोल नहीं है,
लेन-देन का खेल है सब यहाँ ,
अहसासों को कोई मोल नहीं है ,

अपना है मगर..हरजाई बड़ा है ,
इस कमबख्त दिल की न बातों में आना ,
सिखाया था माँ ने ये गुर बहुत पहले ,
हमीं न-समझ थे ,बढ़ी देर से माना !!!

शुक्रवार, अक्टूबर 29, 2010

“ दुःख ”

अपनी इस छोटी सी जिन्दगी में
झेले है कितने दुःख .....
ये में ही जानती हूँ
पर कितने जरुरी थे ये दुःख
ये भी मानती हूँ....

क्योकि –

दुःख ही आदमी को
दुःख से लड़ना सिखाते है,
मंजिल अपने मुकाम की
खुद गढ़ना सिखाते है ..

सिखाते हैं –

है वो ही
असल में जिन्दगी का राजदा
जो दुःख को अपने में समेटेगा …

इसलिए –

मैंने किया है ये अनुभव
सुख की शैया पर
जिन्दगी बहक जाती है
दुःख की दहलीज पर
जिन्दगी चहक जाती है ...

दुःख वो खुशनुमा खवब है
जिसके दामन में जिन्दगी
फूलो सी महक जाती है …

शुक्रवार, अगस्त 06, 2010

" प्यार "

'प्यार' एक शब्द नहीं है...
और ना ही है -
ध्वनि मात्र .....

प्यार तो एक
अनुभूति है ...
भावनाओ का मंजर है ...
धडकनों का स्पंदन है ....

'प्यार'
तुम्हारी स्वभावानाओ का
उद्दगार है ...
तुम्हारी सुदेह की प्रतिकृति है,
और
अभिव्यक्ति है तुम्हारे
ह्रदय भावो की ....

'प्यार'
सिर्फ पोषक नहीं रिश्तो का
यह प्रस्फुटन है संभावनाओ का ....

गुरुवार, अगस्त 05, 2010

मां...

मां...
क़ुहासे की ऊची दीवारो से झाकती एक छवि
धुन्ध की मोटी परत को तोड़्ती एक किरण

परेशानियो की तेज धार को चीरती एक नैया
आग की तेज तपन को हटाती एक ठन्डक

आन्सू भरी आन्खो मे उभरी सांत्वना की एक तस्वीर
हर दर्द की आह के पीछे खुशी की आवाज

हर परेशानी मे लड़ने की हिम्मत
हर गलत कदम के पीछे सही राह दिखाती एक पथ प्रदर्शक

हर सुख दुख को बांटती एक सखी
जीवन पाठ सिखाती एक गुरु

हां...
हर तकदीर से झांकती एक तस्वीर है
मां...

जिसकी हर दुआ मे बसी मेरी खुशी है
जिसकी आंखो से झलकती तस्वीर मेरी है
जिसकी छवि मे दिखता अस्तित्व मेरा है

वही तो है...
मेरी जीवनदायिनी

कहीं ना कहीं इस जग की कर्णधारिणी
मेरी मां...
मां...

सोमवार, जून 14, 2010

" अनमोल सुबह "

वो सुबह नयी थी और शायद सबसे अलग भी,

क्योंकि -

उस सुबह का सूर्योदय नव उदय था मेरे जीवन में

तुम्हारे रूप में ...

एक खुबसूरत संभावना...

की जैसे - िसी चित्रकार ने कोई अक्स बनाया हो

की जैसे - किसी शिल्पी ने ढी हो कोई मूरत अपने मन मंदिर में

की जैसे - किसी कवि ने कोई नया शब्द पिरोया हो अपनी कविता में

की जैसे - किसी कोई मीठा सुर निकला हो किसी साज से ....॥


तुम्हारी उड़ान को अब और विस्तार मिलेगा ,

तुम्हारे खाव्बो के हंस उड़ेंगे और ऊँचे....


क्योंकि -

मैं अपने हिस्से का आकाश भी तुम्हे सौप रही हूँ

रविवार, दिसंबर 27, 2009

"क्यों"

दिल कहता है
थम जा, रुक जा
मन कहता है ये मृगमरीचिका है,
कभी तो तृप्ति होगी
दिमाग कहता है
ये उम्मीदें है,टूट जायेगी
हालात कहते है जिम्मेदारिया है,
जरुरी है, पूरी करो .....
मैं कहती हूँ -
सब कुछ अपने आप हो रहा
है मैं किसी की कुछ भी नहीं,
फिर भी "क्यों" बेनाम, बेवजह, बेबुनियाद
चाहत..... कशिश
जन्म ले रही है ......

शुक्रवार, अक्टूबर 23, 2009

"तलाश "

हर मोड़ पे सफर में जिन्दगी
केआजकल करवट बदल लेती है जिन्दगी
दिशा उठा लेती है
शरीर का बोझा,
दो कदमो के सहारे....

और -

मैं पाती हूँ अपने आप को एक ऐसी जगह,
जहाँ से नजर भी नहीं आते किनारे....
तब -बहुत दूर निकल जाती हूँ
किनारे की तलाश में
पर कुछ नहीं आता हाथ में....

क्योकि -
मंजिल मेरी जिन्दगी की अनजान हैं
किनारों से न अपनी जरा भी पहचान है .........

( "प्राची" की कलम से )