शुक्रवार, अक्टूबर 29, 2010

“ दुःख ”

अपनी इस छोटी सी जिन्दगी में
झेले है कितने दुःख .....
ये में ही जानती हूँ
पर कितने जरुरी थे ये दुःख
ये भी मानती हूँ....

क्योकि –

दुःख ही आदमी को
दुःख से लड़ना सिखाते है,
मंजिल अपने मुकाम की
खुद गढ़ना सिखाते है ..

सिखाते हैं –

है वो ही
असल में जिन्दगी का राजदा
जो दुःख को अपने में समेटेगा …

इसलिए –

मैंने किया है ये अनुभव
सुख की शैया पर
जिन्दगी बहक जाती है
दुःख की दहलीज पर
जिन्दगी चहक जाती है ...

दुःख वो खुशनुमा खवब है
जिसके दामन में जिन्दगी
फूलो सी महक जाती है …

3 टिप्‍पणियां:

Sunil Kumar ने कहा…

दुखों के बारे में इतना कुछ और फिर उसमें खुश हो जाना सुन्दर रचना

बेनामी ने कहा…

"दुःख ही आदमी को
दुःख से लड़ना सिखाते है,
मंजिल अपने मुकाम की
खुद गढ़ना सिखाते है .."

बहुत खूब

हरीश सिंह ने कहा…

आपके ब्लॉग पर आकर अच्छा लगा , आप हमारे ब्लॉग पर भी आयें. यदि हमारा प्रयास आपको पसंद आये तो "फालोवर" बनकर हमारा उत्साहवर्धन अवश्य करें. साथ ही अपने अमूल्य सुझावों से हमें अवगत भी कराएँ, ताकि इस मंच को हम नयी दिशा दे सकें. धन्यवाद . हम आपकी प्रतीक्षा करेंगे ....
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