ऐ मेरी जिन्दगी...
मेरे लिए तुम एक अनजान सी मंजिल का
अनजान सा सफ़र थे
लेकिन आज -
तुम्हारे होने का मुझे अहसास है
तुम्हारे वजूद का...तुम्हारे यथार्थ का मुझे भान है ।
मैंने तुम्हे पहचाना है, मैंने तुम्हे छुआ है
और-
मैंने तुम्हे महसूस किया है ...
ऐ मेरी जिन्दगी...
किसी का किसी में रम जाना,
गुम हो जाना, समां जाना
कोई घटना नहीं बल्कि
"आध्यात्म" है
"आध्यात्म" यानि राधा का कृष्ण में समां जाना "
मेरा तुम्हारे लिए 'प्यार'
एक घटना नहीं बल्किलगातार बढ़ने वाला
भावनाओं का सागर है
ठहरा हुआ मंजर नहीं
बल्कि ना रुकने वाला 'कारंवा' है....
ऐ मेरी जिन्दगी
मैंने तुम्हे, तुम्हारे ही लिए ,
तुमको तुम्ही से चुराकर
अपने आप में रमाया है।
मैं मुझ सी न रहकर
तुम सी हो गयी हूँ ......
विलीन हो गई हूँ तुम में....
मेरा वजूद बन चुका है
एक हिस्सा तुम्हारे अस्तित्व का ।
ऐ मेरी जिन्दगी....
में तुम्हारे वजूद का बन आईना
तुम्हारे व्यक्तित्व को निखारना, संवारना चाहती हूँ।
तुम्हारी धडकनों के संग संग धडकना चाहती हूँ।
बन के खून बहना चाहती हूं
तुम्हारी नसों में....
ओज बन टपकाना चाहती हूँ तुम्हारे चेहरे से......
में तुम्हारे जर्रे जर्रे में खोकर,
तुम्हारे रोम रोम में समाकर
'आध्यात्म' को पाना चाहती हूं...
ऐ मेरी जिन्दगी ....
नियति कुछ लोगो को सदैव
'योग्यतम' के लिए चुन लेती है
तुम भी उनमे से एक हो...
तुम कल अव्वल थे,
तुम्हे सर्वोताम बने रहना है।
वो किसी ने तुम्हारे लिए ही कहा है -
" मील के पत्थर के सहारे मंजिल तक पहुचना क्या
राहे गर आंसा हो तो मजा नहीं कुछ पाने में
"ऐ मेरी जिन्दगी...
तुम सफ़र तय
करो मंजिले खुद ब खुद
तुम्हारे कदमो के निंशा तलाश लेगी ।
तुम बढो आगे...
में रहूंगी हर मोड़ पर साथ सफ़र के
और - कदम दर कदम चलूंगी तुम्हारे संग संग
में भी चाहूंगी निष्ठाये और समर्पण
तुम्हारी भावनाओं का....
बुधवार, सितंबर 30, 2009
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8 टिप्पणियां:
प्यार आध्यात्म की तरफ ही ले जाता है,ज़िन्दगी के मायने कुछ अलग से लगने लगते हैं,
बारिश के बाद धुले पत्तों के सौंदर्य की तरह .........
sahi kaha aapne mausi ji
भावनाए और समर्पण ही जीवन का रस है.....
भावनाए और समर्पण ही जीवन का रस है.....
prachi ji
namaskar
aapne zindagi ko aur adhyaatm ko jodti hui kavvita likhi hai , jo man ko choo jaati hai .
bahut gahre jazbaat ..
badhai sweekar karen..
regards
vijay
www.poemsofvijay.blogspot.com
Lokendra ji, vijay ji apka behad abhar.
प्यार और वैराग्य दोनों एक दुसरे के पूरक हे,
प्यार में इंसा कहता हे,"मुझे बस यही चाहिए,और कुछ नहीं "
वैराग्य में कहता है ,"मुझे कुछ नहीं चाहिए"
..............पूर्णिमा
bahut sundar likhaa hai aapne..........badhai
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